Swetamber Trust & Temples

सम्मेद शिखर की उत्तरी तलहटी पर प्रकृति की गोद पर मंदिरों की नगरी मधुवन बसा हुआ हैं । यहाँ अनेक दर्शनीय स्थल हैं । श्वेताम्बर तीर्थ यात्रियों के लिए यहाँ पर स्थित मंदिरों एवं अन्य दर्शनीय वस्तुओं के निरिक्षण एवं पूजन हेतु सुविधाजनक व्यवस्था है ।

चौदह मंदिरों का समूह:- इस कोठी में चौदह मंदिरों का एक विशाल समूह हैं । मध्य में मूलनायक शांवलिया पार्श्वनाथ का भव्य मंदिर हैं । इसमे शांवलिया पार्श्वनाथ की चमत्कारी मूर्ति के अलावा अन्य भगवानों की मूर्तियाँ विराजमान हैं । ऐसी मान्यता हैं कि यहाँ भक्तो की हर मन्नतें पूरी होती हैं । इस मंदिर की दीवालों पर जैन परम्पराओं को चित्रकारी व्दारा बडे ही सुन्दर ढंग से प्रदर्शित किया गया हैं । इस मंदिर के दक्षिण भाग में पाँच मंदिर हैं जिसमें गौड. पार्श्वनाथ,आदिनाथ, स्वामी गणधर एवं चिन्तामणि पार्श्वनाथ की प्रतिमएँ विराजमान हैं । यहीं पर सम्मेद शिकर पट्ट हैं । इसके नीचे बीस तीर्थकरों के चरण चिन्ह स्थापित हैं । जो भक्तगण पर्वत की वंदना नहीं कर पाते हैं वे इन्ही चरणों के दर्शन कर पुण्य प्राप्त करते हें । मूल मंदिर के पीछे दादा गुरु का मंदिर हैं । फिर प्रारंभ होता हैं मूल मंदिर के उत्तर भाग में मंदिर का सिलसिला । इस भाग में सात मंदिर हैं जिनमें पार्श्वनाथ, चन्द्रप्रभ आदि की मूर्तियाँ स्थापित हैं। सबसे अंत में जलमंदिर हैं जिसमें शांवलिया पार्श्वनाथ की मूर्ति विराजमान हैं ।

भोमिया जी मंदिर :- श्री सम्मेद शिखर तीर्थ के रक्षक भोमियाजी का मंदिर अतिप्राचीन हैं । भगवान महावीर ने कोसम्बीपुरी के समवसरण में विराजमान होकर जो देशना दिया था उसमें बट वृक्ष के नीचे अधिष्ठाता भोमिया जी के मंदिर का वर्णन हैं । भोमिया जी जाग्रत देव हैं । पूरी श्रध्दा -भक्ति से भी व्यक्ति इनसे मन्नत माँगते हैं बाबा तुरत उनकी इच्छा पूरी करते हैं । यही कारण हैं कि भोमिया की पूजा अर्चना जैन एवं अजैन दोनों करते हैं । इस मंदिर के प्रांगण बाबा को प्रसाद चढ़ा कर ही पर्वत की यात्रा प्रांगण में चरण पड़ते ही व्यक्ति धर्म भेद को भूलकर बाबा में लीन हो जाते हैं । यात्रीगण बाबा को प्रसाद चढ़ा कर ही पर्वत की यात्रा प्रारंभ करने से यात्रा निर्विध्न सम्पन्न होती हैं ।

चमत्कारी बाबा :- कभी-कभी भक्तों को अपना चमत्कार भी दिखाते हैं । कभी इनके कानों से खून बहता हैं तो कभी इनके सामने रखा धूप दानी थर-थर मिनटों तक काँपने लगती हैं । इन घटनाओं को देखने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ हैं । शाम होते ही बाबा का दरबार भक्तों से भरने लगता हैं और कुछ देर बाद शुरु होता हां बाबा की भक्ति में डुबो देने वाले कर्णप्रिय भजन । जब होली आती हैं तब भक्ति से सराबोर संगीत की सुरीली आवाज रात भर गुंजती रहती हैं , भक्त गण भाव—विभोर होकर थिरकने लगते हैं और बाबा की कृपा दृष्टि पाकर धन्य हो जाते हैं ।

श्री धर्म मंगल जैन विधापीठ:- कर्म कोलाहलपूर्ण वातावरण से दूर प्रकति की रम्य गोद पर बसा श्री धर्म मंगल जैन विधापीठ शांति -गेह हैं । सुरम्य तलहटी पर स्थित इसके सौंदयपूर्ण प्रांगण में प्रवेश करते ही आध्यात्म -पुष्प की भीनी - भीनी शीतल शुशबू अशांति के ताप को हर लेता हैं । यह भगवान की नगरी का पूर्व प्रांगण हैं । इसकी स्थापना सन् 1972 ई0 में हुई । आचार्य श्री पद्म प्रभ सूरीश्वर जी म0 सा0 की प्रेरणासे इस संस्था का निर्माण हुआ । इस संस्था में उपलब्ध सुविधाएँ अधोलिखित हैं - यहाँ पूजा -अर्चना के लिए शास्त्री पध्दति से बना एक भव्य मंदिर हैं । इसमें पारसनाथ भगवान की मूर्ति प्रतिष्ठत हैं । संपूर्ण मंदिर संगमरमर के तरासे पत्थरों से निर्मित हैं । इसलिए यह अव्दितीय मंदिर हैं । इसके अलावा पद्मावती माता एवं गुरु के दो अव्दितीय कमल मंदिर हैं ।

धर्मशाला :- यात्रियोम के लिए यहाँ एक विशाल धर्मशाला हैं । आधुनिक सुविधाओं से युक्त इस धर्मशाला में 125 कमरे हैं ।

शिक्षा का प्रचार -प्रसार:- इस अरण्य प्रदेश में शिक्षा के प्रचार -प्रसार हेतु यह संस्था श्री विजय भक्ति प्रेम सूरि श्वे0 जैन उच्च विधालय का संचालन करती हैं । यह विधालय धार्मिक अल्पसंख्यक के रुप में सरकार व्दारा मान्यता प्राप्त हैं । इस विधालय में वर्ग षष्ट से दशम वर्ग तक पढ़ाई होती हैं । बोर्ड परिक्षा का परिणाम यहाँ प्रति वर्ष लगभग 70 से 100 प्रतिशत होता हैं

श्वेताम्बर कोठी:- जैन परम्परा का इतिहास से ज्ञात होता हैं कि श्वेताम्बर कोठी का निर्माण जगत सेठ खुशीलचंद (मुर्शिदाबाद पं0 बंगाल) ने सन् 1768 ई0 में कराया था । 235 वर्षों से यह कोठी यात्रियों को अच्छी सेवा प्रदान करती आ रही हैं । इस कोठी की उपलभ्य सुविधाएँ निम्नलिखित हैं -

धर्मशाला
इस कोठी में विशाल धर्मशाला हैं । इसमै आधुनिक सुविधाओं से युक्त 400 कमरे हैं ।

भोजनालय एवं चिकित्सालय
यात्रियों के लिए यहाँ एक विशाल भोजनालय हैं । कोठी के मुख्य व्दार के सामने एक दातव्य चिकित्सालय हैं जिसमें यात्रियों एवं स्थानीय लोगों की चिकित्सा मुफ्त की जाती हैं ।

परिवहन एवं शिक्षा का प्रचार -प्रसार
यात्रियों के लिए मधुवन से गिरिडीह आने -जाने की परिवहन सुविधा संस्था प्रदान करती हैं । शिक्षा के प्रचार प्रसार हेतु यह संस्था एक विध्यालय का संचालन करती हैं । इसमें पंचम वर्ग तक की पढ़ाई अंग्रेजी माध्यम से होती हैं ।

कच्छी भवन:- इस संस्था का निर्माण कच्छी जैन समाज ने सन् 1982 ई0 में करवाया । इस संस्था की उपलब्ध सुविधाएँ अधोलिखित हैं ।

मंदिर
भक्तों के पूजन -अर्चन हेतु यहाँ एक भव्य जिनालय हैं । यह दो मंजिला मूल मंदिर के नीचे तले में अरिहन्त परमात्मा की मूर्ति विराजमान हैं । यह मंदिर के चारों ओर 20 तीर्थकरों एवं अन्य देवी -देवताओं की प्रतिमा विराजमान हैं । मंदिर के ऊपर तले में पार्श्वनाथ एवं अन्य भगवानों की मूर्ति विराजमान हैं । इस मंदिर से संलग्न पूर्व दिशा में मधुचम्पा स्नात्र मंडप हैं जिनमें चार वेदियाँ हैं । उन वेदियाँ में भोमिया जी, श्री घंटाकरण,महावीर महालक्ष्मी देवी एवं गुरु भगवंत की मूर्तियाँ विराजमान हैं ।

धर्मशाला एवं भोजनालय
यहाँ एक विशाल धर्मशाला हैं जिसमें आधुनिक सुविधाओं से युक्त 90 कमरे हैं । इसे धर्मशाला के अन्दर एक विशाल भोजनालय भी कार्यरत हैं ।

श्री पारस कल्याण केन्द:- कच्छी भवन मुख्य व्दार के सामने पारस कल्याण केन्द्र नामक संस्था हैं । यहाँ श्री विजय शांति सूरीश्वर महाराज का मंदिर हैं एवं यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था हैं ।

भोमिया भवन:- श्वेताम्बर श्री संघ व्दार संचालित भोमिया भवन का निर्माण सन् 1975 ई0 में हुआ था । कोठी में यात्रियों को अच्छी सेवा प्रदान की जाती हैं । इस संस्था में उपलब्ध सुविधाएँ अधोलिख

मंदिर
शत्रुंजय मंदिर - भोमिया मंदिर के बगल में शत्रुंजय मंदिर हैं । यह मंदिर दो मंजिल हैं । इसके सतह पर पार्श्वनाथ की मूर्ति विराजमान हैं । प्रथम तले में आदिनाथ भगवान की बारह चौमुखी प्रतिमाओं का समूह हैं । व्दितीय तले में आदिनाथ भगवान की मूर्ति विराजमान हैं । इसके अलावा कोठी के बाहर दादा बाड़ी में स्थिर दादा का मंदिर एवं श्री सुधर्मा स्वामी का राज दोढ़ी मंदिर हैं ।

यहाँ पुष्प वाटिका के मध्य तीन भव्य मंदिर स्थित हैं - शांतिनाथ सह भक्तांबर मंदिर - यह मंदिर दो मंजिला हैं । सतह तले पर मूल नायक आदिनाथ भगवान की प्रतिमा विराजमान हैं । इसके अलावा इस मंदिर में आदिनाथ भगवान की चरण पादुकाएँ, बेड़ी से जकड़े हुए श्री मातुंग की प्रतिमा एंव मंदिर की दीवालों पर उत्कीर्ण भक्ताम्बर की 24 गाथाएँ प्रभृति दर्शनीय हैं । मंदिर के ऊपर तले पर शांतिनाथ भगवान की प्रतिमा विराजमान हैं । शांतिनाथ गुरु मंदिर -इस मंदिर में आबू के महान् योगीराज शांति गुरु की प्रतिमा विराजमान हैं । भोमिया जी मंदिर -इस मंदिर के अग्र भाग में भोमियाजी के देव रुप को दर्शाया गया एवं मंदिर के पीछे घोड़े पर सवार उनके राज रुप को प्रदर्शित किया गया ।

धर्मशाला एवं भोजनालय
इस संस्था में एक विशाल धर्मशाला हैं जिसमे आधुनिक सुविधाओं से युक्त 125 कमरे हैं । यहाँ यात्रियों की सेवा के लिए एक विशाल भोजनालय हैं ।

परिवहन
संस्था से पारसनाथ रेलवे स्टेशन यात्रियों को ले जाने एवं वहाँ से लाने की परिवहन सुविधा संस्था प्रदान करती हैं । ित हैं ।

सराक जैन संगठन :- अखिल भारतीय सराक जैन संगठन नामक संस्था का निर्माण श्री सुयश मुनि की प्रेरणा से सन् 1999 ई0 में हुआ था । यह संस्था जैन म्युजियम से पूर्व दिशा में 300 मीटर की दूरी पर घनी बस्ती में एक छोटी -सी पहाड़ी पर स्थित हैं । इसका उद्देश्य जैन धर्म से बिछुड़े हुए सराक जाति के लोगों में पुन: जैन संस्कार भरना हैं । इस संस्था में उपलभ्य सुविधाएँ अधोलिखित हैं ।

मंदिर
इस संस्था में देवविमान - सा एक भव्य मोदर हैं । यह मंदिर दो मंजिला हैं । इसके सतह तले पर 14 फीट ऊँची कल्पतरु पार्श्वनाथ की प्रतिमा विरामान हैं । इसके चोरों ओर नवग्रह का निर्माण किया गया हैं । इसकी पूजा - अर्चना करने से ग्रह दोष का नाश होता हैं, ऐसी मान्यता हैं । ऊपर तले पर मनमोहन पार्श्वनाथ की प्रतिमा विराजमान हैं ।

छात्रावास
यहाँ एक छात्रावास हैं । सराक जाति के बच्चों को यहाँ धार्मिक सह सामान्य शिक्षा प्रदान की जाती हैं । बच्चों की सारी व्यवस्था नि:शुल्क हैं ।

पांडुकशिला :- सराक संगठन से पूर्व दिशा में 100 मीटर की दूरी पर पांडुकशिला स्थिर हैं । यहाँ भगवान का जलाभिषेक होता हैं, जो दर्शनीय हैं ।